सड़क पर आम
आज दिन के करीब 11 बज रहे थे । बंगलौर की सड़कों लोगों और गाड़ियों के हिसाब से संकड़ी दिखती थी । इन सड़कों जैसी रगों में दौड़ती थी – हमारी अर्थव्यवस्था की जान और रंगीन कारें,खचाखच भड़ी बसें, स्कुटी और मोटरसाइकिलों की पुरी जमात ।
इस तिराहे पर कोई लाल बत्ती नहीं थी पर चेहरे पर मास्क लगाकर खड़ा था – ट्रैफिक पुलिसवाला । लाल बत्ती और हरी बत्ती के ईशारे को उसके हाथों से समझने की जरुरत होती थी । ट्रैफिक ज़ाम का मतलब होता था – कोई आधी किलोमीटर तक गाड़ियों की लाईन । देखकर लगता था – एक का पुँछ पकड़े दुसरा तैयार है – दौड़ लगाने को ।
ऐसी ही गाड़ियों के लाइन में सबसे सामने खड़ा था – एक आमवाला । उसके ठेले पर भड़े परे थे – पीले पीले पके आम । काफी बड़े बड़े आम थे । शायद सुबह ही उसने करीने से सजाए रखे थे – पहाड़ की तरह । इन गाड़ियों और लोगों के बीच में सामने में खड़ा आम का ठेला एक बार तो सबकी नजरें जरुर अटकाता होगा । इस महीने आम की बिक्री भी खुब होती होगी इसलिए आम सजे हुए थे – लगभग ठेले के अंतिम कोनों तक ।
उसके दाहिने बगल खड़ी थी एक हरे रंग की सुंदर सी बड़ी कार । अंदर कार के अंदर बैठे लोग ए सी में म्युजिक सिस्टम सुन रहे होंगे । । कम से कम 50 हजार रुपये की मासिक कमाने वाला कारवाला और 5 हजार रुपये कमा लेने पर खुश होने वाला आमवाला । भारतीय अर्थव्यवस्था की सच्ची तस्वीर । ट्रैफिक जाम में दोनों अटक पड़े – खैर दोनों ही इंतजार कर रहे थे – टैफिक पुलिस की इशारे की । बस हाथ का इशारा होता तो दोनों दौड़ जाते ।
दुसरी और से गाड़िओं की काफी लंबी कतार खत्म हो गयी तब ट्रैफिक पुलिस वाला इधर की और इशारा करने ही वाला था गियर चेंज किया कार वाले और ठेले को थक्का देने के लिए तैयार आमवाला ।बायीं और खड़े नवयुवक अपनी मोटरसाईकिल स्टार्ट कर चुके थे ।
ट्रैफिक पुलिसवाले ने जाने के इशारा कर ही दिया – अचानक आमवाले के बाँयी और से निकल गया एक मोटरसाईकिल वाला । और आमवाला अपने ठेले को धक्का दे रहा था कि थोड़ी झटक लग गयी ठेले में । ठेले के सामने से करीब आठ – दस आम लुढ़क कर सड़क पर गिर गये कार के सामने । कारवाले ने एक्सीलेरेटर नहीं दबाया था पर बस कार के पहिये से बस एक फीट की दुरी पर कुछ आम थे ।
ठेलावाला झट से दौड़कर कार के सामने आ गया – चुनने लगा आम । एक आम को चुनकर हाथों से छाती पर अटकाया फिर दो आम चुनकर ठेले पर उसने रखा । फिर जल्दी से झुकाया सर कार के सामने फिर से चुनने के लिए । किसी तरह से उठा लिया उसने एक आम को – पर बढ़ने लगी कार की गति । अभी भी कई और आम पड़े थे – नहीं रुकी कार । जैसे ही आमवाला ठेले पर आम रखा ही था कि – काली सड़क पर काली टायरों ने आमों को पिचक दिया । कार निकल गयी और पिचका गई दो आमों को । अब भी आमवाला देख रहा था उन आमों को जो गाड़ी के सामने ठीक बीच में गिरे थे – जिन पर टायरें नही जा सकती । बचे आमों को चुनने फिर बढ़ गया आमवाला । चुन लिया उसने दो साबुत आम बिना परवाह किये पीछे हार्न बजाती गाड़ियों का । उसने फिर ठेले पर आम रखा ही था कि फिर बाकी कई आमों को फिर पिचकाती गई दुसरी गाड़ियाँ । अब वह देख रहा था एक बचे आम को – जो सारी पहियों से बच गया – वह उसे चुनना चाह ही रहा थी कि एक जीप का चक्का उसे भी पीस कर निकल गया ।
ठेले के दाहिने – बायें दोनों तरफ से गाड़ियाँ निकलती चली गयी । बीच में रह गये करीब दो किवंटल आमों से लदा एक ठेला – पसीने से लतपत आमवाला – और उसकी दो धँसी हूई आँखें जो देख रही थी सड़क पर पड़ी गुठलियाँ – पिचके आम का पानी सा गुदा – और सड़क से चिपके छिलके ।
अगर बस एक मिनट से भी कम समय बड़े लोग उसे दे देते तो वह अपना सारा आम चुन लेता । किसी ने न सीखी आम की सीख – जो महीनों तक धुप-पानी सहकर एक दिन दुसरों को मिठास देता है ।
2 comments so far
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jarmi ka din gaya, moonsoon aaya. bharat mata ki jai…
Wow! hum Hindustani
Aap bangalore main hain?