एक है मेरी बिमला दीदी

उस दिन 15 साल के बाद, करीब दिन के दस बजे, बहनों से राखी बँधवाकर अपनी गोरी, छोटी नाकवाली बिमला दीदी का याद आ रही थी । माँ से मैने कहा कि बिमला दीदी के यहाँ जाने का मन कर रहा है । माँ को आश्चर्य और खुशी दोनो हूई । उनसे पुछकर मैनें जल्दी से तैयार हो गया । जब जाने लगा तो माँ कहने लगी – रास्ते में मिठाई खरीद लेना । माँ मुझे एक राखी साथ में ले जाने को कही । मुझे अटपटा सा लगा । वह समझाने लगी – कि मैं अचानक जा रहा हूँ ना उसके गाँव में राखी नहीं भी मिल सकती है । हमारे घर पर कुछ राखियाँ हरेक बार बच जाती है – माँ उसमें से एक राखी चुनकर मेरे पाकेट में डाल दी ।

बिमला दीदी वह कोई 10-12 साल की रही होगी तब उसे उसकी, माँ हमारे घर में रख गयी थी । मैनें उसी के पास घुटने टेकना, और दूध-भात खाना सीखा था । फिर कुछ बरसों बाद जब मैं स्कुल जाने लगा था तो उसकी माँ फिर उसे हमारे यहाँ रख गयी थी – ताकि हमलोग शादी के लायक लड़का खोजकर शादी का प्रबंध कर सके । उसकी माँ किसी तरह से छोटी सी अपनी खेती और लोगों के यहाँ खेतों में मजदूरी करती थी ।

मैनें साईकिल उठाई और चल पड़ा बेलगाछी । वैसे उस दिन सुबह भी बारिश हूई थी और आकाश में मेघ थे – सो छाता मैनें ले लिया  था। 15 साल के बाद भी वहाँ का सर्पीला रास्ता मुझे याद है । दो चीजें मैं जल्दी नहीं भुलता – चेहरे और रास्ते । पर बेलगाछी में कहाँ रहती है बिमला दीदी पता नहीं । पर खोज लूँगा मुझे विश्वास था । रास्ते में मिठाई खरीदी, आधा किलो रसगुल्ले – एक पालिथीन में । पालिथीन को डाल दिया साईकिल के हैंडिल पर । आधे रास्ते मैं पहूँचा था कि बारिश शुरू हो गयी । एक पेड़ के नीचे खड़ा हो गया ।

अपनी मिठाई की पालिथीन ठीक कर ली । रास्ते में आस-पास गाँव भी नहीं दिख रहा था । कुछ देर रुकने के बाद मुझे लगा कि मैं समय बरबाद कर रहा हूँ । छाता खोलकर एक हाथ से साईकिल पकड़कर धीरे-धीरे साईकिल चलाने लगा । शायद इस तरह से कुछ दूर और निकल जाऊँ ।

रास्ते में कहीं कहीं पानी जमा हूआ था और उस रास्ते के मरम्मत की सुध किसी को नहीं रहती होगी । हाँ कहीं-कहीं कंक्रीट पत्थर के ढेर नजर आ जाते थे । अचानक रास्ते में किसी पत्थर पर ठोकर लगी और मैंनें छाता नीचे कर साईकिल संभालने की कोशिश की । संभल गया मैं, पर देखा मिठाई की पालिथीन फट गयी थी । उससे रस टपक रहा था । अब मिठाई को हैंडिल पर टाँगकर रखना संभव न था । अब उपर से बारिश एक हाथ में मिठाई की फटी पालिथीन, जिसे अब बस एक ठोकर लगी तो सारी मिठाई सड़क पर बिखर जाती । अब शहर से जा रहे मेरे से मेहमान का हालत क्या हूई होगी – समझ लिजीए ।

मुझे अब एक पालिथीन की जरूरत थी । फटे मिठाई की पालिथीन को मैने बायें हाथ से अपने सीने से लगाकर दुसरे हाथ से साईकिल चला रहा था । शायद एक किलोमीटर गया ही होऊँगा कि एक गाँव सा दिख रहा था । वहाँ तक पहूँचने से पहले पालिथीन के अंदर कई मिठाई टुट चुके थे । वह गाँव बेलगाछी नहीं था पर वहाँ रास्ते में एक पंसारी का दुकान दिखा । मैनें उनसे एक पालिथीन मांगी । दुकानदार मेरी फटी पालिथीन देखकर परिस्थिति समझ गया । उसने एक पालिथीन दी – और भी पतली सी । मैनें सोचा कि उनसे पुछा बेलगाछी कितना दूर है । 2 किलोमीटर – उसने कहा । मेरा मन हुआ एक और पालिथीन माँग लूँ । और बिना कोई सामान खरीदे माँग भी लिया । उसे मैनें सोचा कि उसे एकाध रुपये दे दूँ , फिर लगा कि कहीं रुपये देने से उसके स्वाभिमान को ठोकर न लगे ।

बारिश भी अब धीमी हो गई थी । लगता था धुप भी निकले वाला था । मैं अब पालिथीन को अपनी अँगुलियों में लटकाकर फिर दोनों हाथों से साईकिल चलाने लगा । मैं चलता रहा, रास्ते में कुछ लोग मिलते तो पुछ लेता और कितनी दूर है बेलगाछी ।

विमला दीदी माँ की प्यारी थी । किसी पर गुस्सा कैसे करते हैं – विमला दीदी को पता नहीं था । 1986 – विमला दीदी की शादी हो गयी । हमलोग पुरा परिवार जाकर उसकी शादी का प्रबंध किये थे । पालकी में उसकी विदाई के समय मैं भी रोया था – हाँ आँसु नहीं आये थे, जैसे अपनी बहन की विदाई में आई ।

पर मुझे पता था कि जीजाजी किसी बेकरी में काम करते थे । हमारे शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर बेलगाछी गाँव में शादी हूई थी उसकी । और उसकी शादी के बाद बहुभात में मैं उसके गाँव मामाजी के साथ गया था उसके बहूभात के दिन । दोनो की जोड़ी दो सीधे बैल की जोड़ी थी ।

ऐसी ही बातें सोचते सोचते मैं पहूँच गया बेलगाछी के करीब । रमजान नदी के किनारे बेलगाछी का गाँव वही था – दिल मेरा पुरा गवाह दे रहा था । पर अब गाँव में पहूँचकर किससे कैसे पूछेंगे – बिमला दीदी के बारे में पता नहीं । वह मुझे पहचान पाएगी भी नहीं या मैं उसे पहचान पाऊँगा भी कि नहीं ।

अगर गाँव में प्रवेश से पहले किसी से बिमला दीदी के बारे में पुछ लूँ तो अच्छा रहेगा । मैं आगे बढ़ गया । दूर से दिख रहा था एक बट वृक्ष के नीचे कुछ महिलाएँ बैठी थी । निकट गया तो पता चला वो खेत के मजदूर है । पास में धान की रोपनी हो रही है । शायद दोपहर के खाने के लिए बैठी है । मै साईकिल से उतर कर उनकी ओर जाने लगा । सब महिलाएँ मेरी ओर देखने लगी । कैसे पूछूँ और किससे पूछूँ – एक अजीब सा उधेरबुन में था मैं । उनके सामने मुझे ऐसा लग रहा था कि सब महिलाओं के जिज्ञासु चेहरे मुझसे स्वाभाविक रूप से पुछ रहे थे – आप किसे खोज रहे हैं । मेरी नजरें बीच में बैठी एक महिला पर अटक गयी । गोरी सी, छोटी सी नाक । और उसकी आँखे मुझ पर । मुझे लगा कि वह बिमला दीदी जैसी लगती है । मैनें अपने को धिक्कारा – 15 साल के बाद ऐसे किसी मजदूर महिला के साथ बिमला दीदी को कैसे तुलना कर सकता हूँ । पर वह महिला मेरे तरफ देखे जा रही थी । मुझे लगा कि उन्हीं से पुछ लूँ ।वो अपने बगलवाली महिला से कुछ बात करने लगी – फिर अचानक कह उठी हमारे देशी भाषा में – “प्रेम नाकी” ( प्रेम हो क्या ) ।

“बिमला दीदी” – मैनें भी पुकार लिया । “भाई रे – भाई” – वह उठकर सामने आने लगी । सारे औरतें हम दोनों की और देखने लगी । मैनें साईकिल को स्टैंड लगाकर आगे बढ़कर उसके पैर छूए । वह बाकी महिलाओं को कहने लगी – जिस भाई की बात वह आज उनसे कर रही थी – वह मैं ही था । आज वह किसी को राखी नहीं पहनाई थी । कई साल पहले वह राखी लेकर हमारे घर आई थी और हम भाईयों को घर में नहीं पाकर चली गयी थी । वह दूसरे मजदूरों को कह दी कि वह घर जा रही है – वह अब नहीं आएगी । मैनें मिठाई की पालिथीन उसके हाथ में थमा दी ।

सब महिलाओं के चेहरे पर आश्चर्य का भाव और विमला दीदी के लिए खुशी का सागर । मैनें पुछा, वह मुझे कैसे पहचानी । उसने सरल शब्दों में मुझे चुप कर दिया – “जो मेरे सामने घुटने टेकने सीखा, खाना सीखा, उसे मैं नहीं पहचान सकूँ” । मैनें पुछा – वह यहाँ खेतों में क्या कर रही थी , चुकि मेरा विश्वास था कि वह शायद मजदूरों कि निगरानी के लिए आयी होगी । उसने बतायी – आजकल थोड़ा काम मिला है, कई दिन से वही कर रही थी । मेरी बिमला दीदी – खेत की मजदूर । जीजाजी किसी मिठाई के दुकान में आजकल काम करते हैं ।

मैं उसके साथ उसके घर गया । देखा उसका दो घर , कच्चा सा । एक रसोईघर, कोने में । उसने सारा हाल कह सुनाया कैसे उसके दिन बीते । बीच में बगल की एक लड़की को बुला लाई खाना बनाने के लिए । और मुझे नास्ता परोसा – भूजे हूए चुरा दुकान से अभी खरीदी डालमोट और आलु की महीन भुजिया ।

और कह गयी बेटी को आँगन लेपने और खुद निकल गयी गाँव की और – अगर मैं गलत ना था तो कुछ खरीदने । वापस आकर नहाने गयी – और नयी सुती साड़ी पहनी, शायद शादी-विवाह में एकाध बार पहनी होगी और पुरानी मैंचिंग की ब्लाउज । बीच बीच में रसोई में जाकर कुछ कह आती । उसके आँगन में आज मेहमान आया है ।

उसने राखी की थाली सजाई – बरामदे पर – दुब, धान, पानी का लोटा – उसमे आम का पल्लव । टीका के लिए चंदन तो था नहीं थोड़ी सी कहीं की रखी अबीर । और थाली में एक कोने पर पड़ी थी – दीदी का खरीदा हुआ राखी – छोटा सा – शायद दो रुपये का होगा – फोम पर चमचमाते प्लास्टिक और लटकते नन्हें से धागे – पतले से । बैठने के लिए लकड़ी की पिढि़या । मैं बैठ गया । मुझे याद थी कि मेरा पाकेट में घर से लायी राखी पड़ी है – पर मेरा मन हुआ कि मैं वही राखी पहनूँ । सस्ती वाली दीदी की । धान-दूब से मेरा आदर हुआ । हमारे यहाँ शुभ मुहूर्त में महिलाँए उलू ध्वनि देते है । उसने भी दी । अब वह राखी को उठाकर उलट पलट ही रही थी और बता रही थी – उसके गाँव में एक ही दुकान में राखी मिली । राखी के धागे इतने छोटे थे कि मेरी कलाई मे नहीं बँधते । वह अफसोस कर रही थी । मेरा मन नहीं माना – मैनें बता दिया कि माँ ने एक राखी भेजी है और निकालकर उसे दिखाया । शहर की डिजाईनर राखियाँ – उसके आँखों में एक चमक सी छा गयी । पर मैनें कहा कि, दीदी मुझे आप अपनी वाली राखी पहनाओ । लेकिन अच्छी राखी पाकर, वह अब अपनी राखी को अलगकर रख दी । वह कहने लगी, मामी ( मेरी माँ को वह मामी कहती है ) कितनी अच्छी है । मैं हमेशा कि तरह मान गया, कहानियों और कविताओं से परे महिलाओँ की कुछ भावनाएँ महिलाँए ही समझती है ।

हाँ एक कटोरे में मिठाई थी – मेरा लाई हूई । मुझे वह मिठाई खिलाने लगी – और अपने मुँह की अधकटी मिठाई मैनें भी उसे खिलाई । मैनें थाली में रख दिये सौ रुपये का नोट । शाय़द दो दिन की मजदूरी सी होगी । पर वह अधिकार से बोल पड़ी – भाई अगले बार साड़ी लुँगी ।

अब जब तक खाना पक रहा था । वह मुझे गाँव में सब संबंधी के घर घुमाने ले गयी । और बीच-बीच में बताती जाती – कैसे लोगों ने जमीन बँटवारे के समय जीजाजी के साथ बेमानी की । पर आश्चर्य मुझे लगा कि सबके साथ उसके व्यवहार अच्छे थे । सारे जगह पर वह भाई की बड़ाई करती और शो-मेन जैसा पेश करती जाती । चाय का पेशकश मुझसे पहले वही ठुकरा देती – पर वह अंडे के बारे में सबसे पुछ लेती । गाँव में अंडे दुसरों के घरों से खरदते हैं। अंतिम मे एक घर पर चाय के लिए हां कह दी । और वहाँ से कुछ अंडे भी ले ली ।

खाना बन गया था -मेहमान को अकेले नहीं खिलाना चाहिए इसलिए साथ में बैठा था उसका बेटा जो छठी में पढ़ता था । परोसा गया – मोटा चावल का भात, लकड़ी के चुल्हें पर पका मुँग का दाल, भिंडी की भुजिया , पटुए का साग, आलु-परवल की तरकारी और स्पेशल आईटम – अंडे का आमलेट । फिर भोजन समाप्ति पर वही मेरी वाली मिठाई फिर से ।
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आज अभी रक्षा-बँधन का बर्ह्ममुहूर्त है । सुरज उगने में कई घंटे और बाकी है – पर बिमला दीदी के लिए यह रतजगा छोटा संस्मरण भी कम है । कल आफिस की कामों में उसे याद कर पाऊँ या ना कर पाऊँ, पर मुझे पता है -फिर कल दिन में शायद धान की खेतों में बहना – भाई को याद करेगी ।

16 comments so far

  1. समीर लाल on

    तीन दिन के अवकाश (विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में) एवं कम्प्यूटर पर वायरस के अटैक के कारण टिप्पणी नहीं कर पाने का क्षमापार्थी हूँ. मगर आपको पढ़ रहा हूँ. अच्छा लग रहा है.

  2. sunflower on

    आज कल ऐसा देखने को कम ही मिलता है। पुराने रिश्ते समय के साथ धुँधला जाते हैं, कभी कभी खून के रिश्ते भी। और इस तरह के रिश्ते को सँजो के रखना बस किताबों और TV serial में ही नज़र आता है। क्या सचमुच ऐसा होता है?

  3. Lavanya on

    Aap se yehi anurodh hai ki, Bimla didi se sampark bnaye rakhiyega.
    Bada marmik vivran likha hai aapne.
    Padker aankhen bhur aayeen.

    L

  4. mamta on

    बहुत ही मर्मस्पर्शी ।

    राखी की बधाई आपको और आपकी बिमला दीदी को !

  5. अनूप शुक्ल on

    अद्भुत मार्मिक संस्मरण!

  6. Sanjeet Tripathi on

    गहरे छू लेने वाला संस्मरण!!
    शुक्रिया इस संस्मरण को हमसे बांटने के लिए!!

  7. ghughutibasuti on

    पढ़कर बहुत अच्छा लगा । ऐसा निर्मल स्नेह अमूल्य है ।
    घुघूती बासूती

  8. प्रेम पीयूष on

    समीर जी,
    मुझे ऐसा लग रहा है कि कंप्यूटर में यूँ वायरस का आना आपको विवाह के वर्षगाँठ के लिए समय निकालने का संकेत सा था । यूँ बाकी समय आपका साथ हमें मिलता रहे तो और क्या चाहिए । जानकर प्रसन्नता हूई कि आपको लेख पसंद आयी।

    सूर्यमुखी जी,
    हिन्दी में आपकी टिप्पणी पाकर अच्छा लग रहा है।
    मैं कोशिश करता हूँ रिश्तों को जीने का । एक बात कहूँ – मैं तो टूटे खिलौने भी नहीं फेंक सकता । और मैनें सुना है – शब्दों में बँधे रिश्ते हमलोगों से भी ज्यादा लंबी उम्र जीते हैं । समय-समय पर इस चिट्ठे पर भी आती रहें ।

    लावण्या जी,
    ऐसा है ना कुछ बूँदे यहाँ भी टपकी थी और कुछ वहाँ । और एक नदी बेलगाछी के किनारे से बह गयी । हाँ कोशिश करूँगा कि दीदी के बच्चों के लिए कुछ कर पाऊँ ।

    ममता जी,
    दीदी और मेरी तरफ से आपको भी प्रतिदिन की शुभकामनाएँ । आपको बहूत-बहूत धन्यवाद ।

    अनूप जी,
    आपका प्यार खींच लाया फिर से । और ऐसे ही प्यार में मर्म होना स्वभाविक है ना ।

    संजीव जी,
    धन्यवाद, काश बिमला दीदी आज इसे पढ़ पाती ।

    घुघूती बासूती जी,
    मुझे भी अच्छा लग रहा है कि मैं अपने अनमोल भावनाओं को आप तक पहूँचा सका । धन्यवाद ।

  9. Manish on

    बहुत सुंदर ! भाई बहन का आपसी प्रेम यूँ ही बना रहे।

  10. Juneli on

    If I’m not I’m reading about your Bimala Di third time.

    This was really emotional and touchy post. I was crying reading. There are few posts made me cry and it is one of them.

    Hats off for your love, respect and feelings for your Bimala Di, there are very few people who believe and care for the relationships.

    I’m sure after that you have not visited her. As you wrote there … “वह अधिकार से बोल पड़ी – भाई अगले बार साड़ी लुँगी ।” and “फिर कल दिन में शायद धान की खेतों में बहना – भाई को याद करेगी ।” she might be waiting for you. And my suggestion for you- you don’t have to wait for Rakhee, Durga Pooja, Deewali or Holi for meeting her or gifting her. Whenever you get time, you can go and meet her. Just a day out of 365 days would be enough for her.

    God bless you and your Bimala Di.

    P.S. in lighter vain – when you go next time, don’t take the sweets in plastic but in a box :) :D

  11. Prem Piyush on

    मनीष जी,
    धन्यवाद ! जानकर अच्छा लगा कि आपको रचना सुंदर लगी । आशा है आपका विश्वास सार्थक होगा ।

    जुनेली,
    हरेक बार राखी में आपके ब्लाग पर अनोखे पोस्ट पढ़ता था इस बार मेरे भी चिट्ठे पर कुछ पढ़ाऊँ यही कोशिश की।

    कोशिश करता हूँ को पाठकों को रुचिकर लगे – पर इतनी दूर यूँ छू जाएगी – सोचा न था ।

    आपका अनुमान बिलकुल सही है – नहीं मिल पाया हूँ उनसे उस राखी के बाद । इस बार घर गया तो पक्का मिलुँगा उनसे चाहे वह कोई भी दिन हो । और हाँ साथ में ले जाऊँगा – साड़ी , “डब्बे में मिठाई” और आप सबों का ढेर सारा प्यार । तब फिर एक संस्मरण और लिखुँगा ।

    यूँ ही प्रेरित करते रहें मुझे । बहूत-बहूत धन्यवाद ।

  12. Praney on

    I just came over to take a glimpse but when I started reading I just could not stop till finish. A very touching tale, which took me along the ride.

    Keep it up and best of luck.

    How you comment in Hindi?

  13. Jalsingh Bhagour on

    Very Nice Vimla Didi Bhai bhan ka samband aisesa hi bana rahe
    बहुत सुंदर ! भाई बहन का आपसी प्रेम यूँ ही बना रहे।

  14. Lalit Sharma on

    Aap se yehi anurodh hai ki, Bimla didi se sampark bnaye rakhiyega.
    Bada marmik vivran likha hai aapne.
    Padker aankhen bhur aayeen.
    Bimla didi ko mera bhi parnam.

    LALIT SHARMA
    JAIPUR
    RAJASTHAN.

  15. sunil kumar sharma on

    aap ki kahani bahut he pyari hai aap ki kahani padh kar mughe asa lagha kash mere bhi sister hoti

  16. very nice on

    yaaar kya batau… office me pad raha hoon ye kahani,,, aur mere bat ka biswas karna,,, pure kahani ko padane me main kam se kam 10 bar ruka aur apana dhyan batane ki koshish ki aur apne aapko rone se,,, lambi sanse lekar apane aapko rone se bachata raha… itni marmik kahani hai ye…

    really very nice…

    nice line…

    … “वह अधिकार से बोल पड़ी – भाई अगले बार साड़ी लुँगी ।” and “फिर कल दिन में शायद धान की खेतों में बहना – भाई को याद करेगी ।”


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