अनूप जी के लिए

प्रिय अनूप जी,

आपका लेख पढ़ा । ऐसे
मैनें वहाँ टिप्पणी तो डाल दी है पर कुछ और लिखना चाहता हूँ ।

आप माने न माने पर एक बात तो सच है भावनाएँ वाई-फाई (wi-fi) होती हैं। इंटरनेट तो बस एक माध्यम हैं । एक तरफ आप किसी खास विषय पर सोचते हैं तो आपका दिल से नजदीकी मित्र आपको याद करता है और उसी विषय पर कुछ पुछ बैठता है । आज मेरे साथ ऐसा ही कुछ हुआ ।

आज कुछ तो गाओ तुम साजन,
क्यों आज सुना तेरा फिर आँगन ।
चुप क्यों हो फिर तुम, यूँ मौन धरे,
तू गाता चल, ……

आज जब मैं ये पंक्तियाँ टाईप कर ही रहा था तो जीमेल पर जीतू जी का चाट मैसेज कुछ यूँ टपक पड़ा ।

जीतू: http://hindini.com/fursatiya/?p=312 tumko yaad kiya ja raha hai

चूँकि यह लिंक फुरसतिया से संबंधित था और वहाँ याद किये जाने कि बात हो रही थी तो मुझे पक्का लगा कि मेरी खिचाई हुई होगी मस्त । खैर एक क्लिक में रिश्ते बनने-बिगड़ने वाली इंटरनेट की दुनिया में मैंने भी बस क्लिक ही किया था कि मेरा पुरा दिमाग री-बुट हो गया ।

सच पुछिए तो उस समय कविता लिखने का मुड तो थोड़ा अजीब सा तो हूआ पर शुभ आश्चर्य हुआ कि मेरे कविता की पंक्तियों और वहाँ पर आपके लेख में काफी समानता ही दिखी । कविता में, मैं सोच रहा था एक ऐसे आँगन के बारे में – जो अभी शांत सा है – और उसकी चुप्पी शायद मुझे खलती है । और बस ऐसा ही दुसरी तरफ ऐसा ही मेरे लिए कोई सोच रहा है – मुझे विश्वास नहीं हो रहा था ।

हाँ तो अनूप भैया, आपका स्नेह निश्छल है । मैं वापस आ गया हिंदी चिट्ठाकारी में । जहाँ हाय – हैलो की सभ्यता से दूर एकदम गाँव का चौपाल, जहाँ कहीं कोई खैनी दबाकर दाँव ठोकता है तो कहीं किसी को पान चबाकर, चुपके से पीक फेंकने की कला भी आती है । तकनीकी भैया लोग कहीं नारद को हाई-टेक कर रहे हैं तो कहीं देबुदा निरंतर सबकी बातें करना चाहते हैं । रविजी और देबुदा के देशी दिल का पक्का लगन काबिले तारिफ है । भुल नहीं सकता कि जब भी जरुरत पड़ी इन्होनें सहायता की है मेरी ।

कहीं मैनें पूर्वी को खोया तो लगा – क्या मासुम रिश्ते भी भ्रम से हैं – हाय रे विधि का विधान । तो कहीं निराश मन को जगाकर कंधो का मजबुत करने की बात आयी, उन पर खेलने वाले जो आ गये है – मैं चाचाजी , मामाजी या यूँ कहें इंगलिश में अंकलजी बन गया हूँ ना ।

हाँ तो सच में मैं खोया था । रिश्ते खुद से बना रहा था । कुछ बातें दुसरों से समझ रहा था तो कुछ खुद को समझा रहा था । काफी संघर्षपूर्ण रहे आपसे बिछड़े दिन । लेकिन आज मुझे भी सुनने के लिए आप सब साथ हैं और क्या चाहिए मुझे । मै आपके साथ चलता जाऊँगा ।

आपका,
अधकटी पेंसिलवाला ।

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4 comments so far

  1. जीतू on

    आओ प्यारे!
    बहुत दिनो बाद आए।
    अब जब बात प्रेम पीयूष की हो रही है तो मै बताना नही भूलूंगा कि जब मै साउथ इन्डिया की यात्रा पर गया था, प्रेम पीयूष ने ही सारी यात्रा का प्रबन्ध किया था। इससे पहचान सिर्फ़ इन्टरनैट पर ब्लॉग के जरिए थी, लेकिन मिलने के बाद आत्मीयता का स्तर एवरेस्ट को छूने लगा। तभी तो इन्टरनैट को लोगो को जोड़ने का माध्यम कहते है। हमारी चिट्ठाकारी इस जुड़ाव मे फैवीकोल का काम करती है।

  2. प्रियंकर on

    प्रेम पीयूष को पहले भी पढा था . उनके लेखन में एक खास किस्म की तरलता हमेशा लक्षित की जा सकती है जो उनके भावुक मन का ही विस्तार है . उन्हें लेखन की ओर लौटना चाहिए और पूरी दमदारी से लौटना चाहिए .

  3. समीर लाल on

    अब शुरु हो जायें लिखना. शुभकामनायें.

  4. अनूप शुक्ल on

    प्रेम पीयूष भाई, यह पोस्ट पढ़्कर बहुत अच्छा लगा। मैं अक्सर तुम्हारे पुराने लेख, कवितायें पढ़ता-याद करता था। आज पोस्ट इसीलिये लिखी ताकि कुछ हिंदी में लिखना फ़िर शुरू करो। वैसे अंग्रेजी वाले पोस्ट भी देखी थी आज। अच्छी लगी थी। दोनो भाषाऒं में अभिव्यक्ति करते रहो अच्छा है।


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